चकिया/चंदौली: जिले के स्वास्थ्य महकमे की नाक के नीचे चल रहे “मौत के अड्डों” ने एक और हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया है। कोतवाली क्षेत्र के दुबेपुर स्थित बी एन सर्जिकल सेंटर में लापरवाही की ऐसी दास्तान लिखी गई, जिसने न केवल मानवता को शर्मसार किया है, बल्कि चंदौली के स्वास्थ्य प्रशासन की ‘सेटिंग-गेटिंग’ वाली कार्यप्रणाली पर भी बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
क्या है पूरा मामला?
दुबेपुर स्थित इस अस्पताल में सोमवार सुबह एक महिला को प्रसव के लिए भर्ती कराया गया। ऑपरेशन के जरिए बच्चे की किलकारी तो गूंजी, लेकिन मां की किस्मत में मौत लिखी थी। परिजनों का सीधा आरोप है कि शाम को जब महिला की हालत बिगड़ी, तो अस्पताल प्रबंधन ने मानवीयता को ताक पर रख दिया।
बड़ी लापरवाही:
गंभीर हालत में महिला को बिना किसी ऑक्सीजन सपोर्ट के वाराणसी के लिए धकेल दिया गया। एम्बुलेंस में जीवन रक्षक उपकरणों का न होना महिला के लिए काल बन गया। वाराणसी पहुँचते ही डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
अधिकारियों के लिए चुभते सवाल?
इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं:बिना रजिस्ट्रेशन कैसे चल रहा था अस्पताल?
स्थानीय लोगों का दावा है कि यह अस्पताल बिना किसी मानक और वैध रजिस्ट्रेशन के धड़ल्ले से चल रहा था। क्या स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों को इसकी भनक नहीं थी? या फिर “महीने की मोटी रकम” ने उनकी आंखों पर पट्टी बांध रखी है?
फरार संचालक पर एक्शन कब?
मौत की खबर मिलते ही अस्पताल संचालक का भाग जाना साफ दर्शाता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
क्या फाइलें दबाने की हो रही है कोशिश?
सूत्रों की मानें तो मामले को ‘मैनेज’ करने के लिए सफेदपोश और रसूखदार सक्रिय हो गए हैं। क्या पुलिस और प्रशासन इन दबावों के आगे घुटने टेक देगा?
जनता में भारी आक्रोश, बवाल की स्थिति
घटना के बाद से ही परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। अस्पताल के बाहर मचे बवाल और चीख-पुकार ने प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। लोगों की सिर्फ एक ही मांग है— “हत्यारों पर मुकदमा दर्ज हो
बिना ऑक्सीजन, वाराणसी रेफर:
क्या तड़पाकर मारना ही लक्ष्य था?परिजनों का कलेजा फट रहा है यह बताते हुए कि अस्पताल प्रबंधन ने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दीं। हालत बिगड़ने पर महिला को बिना ऑक्सीजन सपोर्ट के वाराणसी रेफर कर दिया गया।
साहब, रेट लिस्ट क्या है?
क्या चंदौली के अवैध अस्पतालों से आने वाले ‘महीने के लिफाफों’ ने अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बांध दी है?
रजिस्ट्रेशन का खेल:
बिना मानक और बिना वैध रजिस्ट्रेशन के यह अस्पताल किसके संरक्षण में फल-फूल रहा था? क्या
स्वास्थ्य विभाग की जांच टीमें सिर्फ ‘चाय-पानी’ के लिए निकलती हैं?
हत्या का मुकदमा क्यों नहीं?
लापरवाही की इंतहा होने के बाद भी संचालक फरार है। क्या पुलिस और प्रशासन उसे ‘मैनेज’ करने का समय दे रहे हैं?










