बुलंदशहर/छतारी: पर्यावरण संरक्षण के दावों के बीच छतारी थाना क्षेत्र के गाँव धोरऊ में वन माफियाओं ने नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं।
रिपोर्ट दीपक चौहान
यहाँ ‘विकास’ की आड़ में ‘विनाश’ का ऐसा खेल चल रहा है जिसने न सिर्फ इलाके की हरियाली को जख्मी कर दिया है, बल्कि सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आंकड़ों की बाजीगरी:



14 अतिरिक्त पेड़ों पर चली कुल्हाड़ीविश्वस्त सूत्रों और मौके के मुआयने से पता चला है कि धोरऊ में आम के बाग के कटान के लिए 34 पेड़ों की अनुमति (Permission) ली गई थी। लेकिन माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने परमिशन की आड़ में अब तक 48 पेड़ों को जमीनदोज कर दिया है।



बड़ा सवाल: आखिर वो 14 पेड़ किसके इशारे पर काटे गए जिनका रिकॉर्ड फाइलों में दर्ज ही नहीं है? क्या वन विभाग और स्थानीय पुलिस को इस ‘अतिरिक्त’ मुनाफे की भनक नहीं है?
प्रशासनिक मिलीभगत या घोर लापरवाही?नियमों के मुताबिक, बाग के कटान के समय संबंधित विभाग के अधिकारियों की निगरानी अनिवार्य होती है। लेकिन धोरऊ में हो रहे इस कत्लेआम ने साफ कर दिया है कि:निगरानी शून्य है: परमिशन से ज्यादा पेड़ कट जाना विभागीय लापरवाही का जीता-जागता सबूत है।माफिया का खौफ: क्या ठेकेदार इतने ताकतवर हैं कि उन्हें शासन-प्रशासन का कोई डर नहीं है?पर्यावरण की अनदेखी: एक तरफ सरकार वृक्षारोपण के लिए करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर फलदार बागों को अवैध रूप से उजाड़ा जा रहा है।
क्षेत्र में आक्रोशगाँव के लोगों में इस अवैध कटान को लेकर गहरा रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर जल्द ही इस पर रोक नहीं लगाई गई और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो पर्यावरण को होने वाली इस क्षति की भरपाई नामुमकिन होगी।हमारा सवाल: क्या बुलंदशहर प्रशासन इन 14 ‘अवैध’ कटे पेड़ों का हिसाब लेगा? क्या ठेकेदार का लाइसेंस निरस्त होगा और संबंधित लापरवाह अधिकारियों पर गाज गिरेगी?









