मिर्जापुर में सरकारी कर्मचारियों से अवैध वसूली और ‘गुंडा टैक्स’ का साया: प्रशासनिक हलकों में हड़कंप
मिर्जापुर: उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक और प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण जिले मिर्जापुर में इन दिनों एक संवेदनशील मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, जिले के विभिन्न विभागों में तैनात सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को निशाना बनाकर कथित तौर पर ‘गुंडा टैक्स’ और अवैध वसूली किए जाने का मामला सामने आ रहा है। इस अवैध और समानांतर वित्तीय सिंडिकेट के पीछे कुछ स्थानीय राजनीतिक गिरोहों और प्रभावशाली तत्वों की संलिप्तता की बात कही जा रही है, जिससे महकमे में भारी असंतोष और भय का माहौल है।
अवैध वसूली का नेटवर्क और कार्यप्रणाली
प्राप्त जानकारियों के मुताबिक, यह गिरोह मुख्य रूप से ऐसे विभागों को अपना निशाना बना रहा है जहाँ जनता के कार्यों या विकास कार्यों के नाम पर बड़े पैमाने पर बजट का आदान-प्रदान होता है।
- स्थानांतरण और तैनाती का डर: आरोप है कि ये तथाकथित राजनीतिक गुर्गे सरकारी कर्मचारियों को मनचाही तैनाती या स्थानांतरण का भय दिखाकर अवैध लेवी (गुंडा टैक्स) वसूलने का दबाव बनाते हैं।
- विकास कार्यों में दखलअंदाजी: निर्माण कार्यों, पंचायती राज, और ग्रामीण विकास से जुड़े महकमों में फील्ड पर तैनात कर्मचारियों को धौंस देकर उनका हिस्सा मांगा जाता है। ऐसा न करने पर प्रशासनिक कार्यों में अडंगा डालने और झूठी शिकायतों के जरिए मानसिक प्रताड़ना देने के हथकंडे अपनाए जाते हैं।
शासन के ‘जीरो टॉलरेंस’ दावों को खुली चुनौती
प्रदेश की वर्तमान सरकार भले ही भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति का दावा करती हो, लेकिन मिर्जापुर में इस तरह के राजनीतिक सरपरस्ती वाले गिरोहों का सक्रिय होना प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। ईमानदार और मैदानी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कर्मचारियों का एक वर्ग दबी जुबान में यह भी कह रहा है कि यदि समय रहते इन सफेदपोश अपराधियों और सिंडिकेट पर नकेल नहीं कसी गई, तो यह प्रशासनिक मशीनरी के मनोबल को पूरी तरह तोड़ देगा।
खुफिया तंत्र और पुलिस की भूमिका पर नजर
मामले के तूल पकड़ने के बाद अब स्थानीय खुफिया इकाइयों (LIU) और प्रशासनिक उच्चाधिकारियों के कान खड़े हो गए हैं। हालांकि, खुलकर सामने आकर अभी तक किसी कर्मचारी ने औपचारिक लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई है, क्योंकि उन्हें राजनीतिक रसूख रखने वाले इन तत्वों से अपने करियर और सुरक्षा का खतरा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि जिला प्रशासन और पुलिस कप्तान ने इस मामले में त्वरित और कड़ा कदम उठाते हुए निष्पक्ष जांच नहीं की, तो यह मुद्दा जनप्रतिनिधियों और शासन के लिए भी बड़ी फजीहत का कारण बन सकता है। देखना यह होगा कि सुशासन के दाوओं के बीच प्रशासन इन दबंगों पर कब और क्या कार्रवाई करता है।












