​संत या शहंशाह? करोड़ों की गाड़ियां और प्राइवेट जेट… आखिर क्या है सतुआ बाबा के इस ‘रॉयल’ वैराग्य का सच?

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प्रयागराज: संगम की रेती पर जहाँ सन्यास का मतलब धूल, राख और फकीरी समझा जाता है, वहां एक ऐसा संत भी है जिसके ठाठ-बाट देखकर अच्छे-अच्छे रईसों के पसीने छूट जाएं। आंखों पर महंगा काला चश्मा, पीछे मर्सिडीज और पोर्श जैसी गाड़ियों की कतार और आसमान में उड़ता प्राइवेट जेट। पहली नजर में यह किसी फिल्म का दृश्य या किसी बड़े बिजनेसमैन का काफिला लग सकता है, लेकिन यह हकीकत है जगतगुरु महामंडलेश्वर संतोष दास उर्फ ‘सतुआ बाबा’ की।​अक्सर लोग सवाल उठाते हैं कि क्या एक वैरागी को इतने वैभव की शोभा देती है? लेकिन जब आप इस चमक-धमक के पीछे की कहानी और बाबा के तर्क सुनते हैं, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।

त्याग की वो नींव, जिसे दुनिया ने नहीं देखा​

आज की लग्जरी को देखने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि इस वैभव की शुरुआत एक कठोर त्याग से हुई थी। संतोष दास ने उस उम्र में घर की सुख-सुविधाओं को तिलांजलि दे दी थी, जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं।

11 साल की उम्र में गृहत्याग: महज 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने संसार से मोह तोड़कर अध्यात्म का कठिन मार्ग चुना।​

300 साल पुरानी परंपरा: वे विष्णस्वामी संप्रदाय की कठिन साधना से गुजरे और अपनी योग्यता के दम पर इस प्राचीन पीठ के 7वें आचार्य बने।

​”यह मेरा नहीं, सनातन का ऐश्वर्य है”​जब बाबा से उनकी महंगी गाड़ियों (जैसे लैंड रोवर डिफेंडर और मर्सिडीज GLS) के बारे में पूछा जाता है, तो उनका जवाब किसी को भी सोचने पर मजबूर कर देता है। बाबा कहते हैं— “एक समय था जब सनातन धर्म को गरीबी और पिछड़ेपन से जोड़कर देखा जाता था। आज का भारत बदल रहा है। ये गाड़ियां भक्तों का प्रेम हैं और सनातन के बढ़ते गौरव का प्रतीक हैं। अगर भक्त अपनी श्रद्धा अर्पित करता है, तो उसे ठुकराना उसके प्रेम का अपमान है।”

युवाओं के ‘आइकन’ और धर्म के रक्षक​सतुआ बाबा आज की GenZ पीढ़ी के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। जहां युवा धर्म से दूर भाग रहे थे, बाबा ने उन्हें स्टाइलिश अंदाज में धर्म से जोड़ दिया है।

​आधुनिकता और परंपरा का मेल: वे दिखाते हैं कि धर्म का पालन करने के लिए आपको दुनिया से कटने की जरूरत नहीं है।​

बेबाक राष्ट्रवाद: वे सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं; बांग्लादेश, पाकिस्तान और राष्ट्रहित के मुद्दों पर उनके कड़े तेवर बताते हैं कि वे एक सजग संत हैं।​

सेवा का संकल्प: उनके भव्य शिविर में करोड़ों की गाड़ियां खड़ी जरूर होती हैं, लेकिन अंदर हजारों गरीबों और श्रद्धालुओं के लिए 24 घंटे भंडारा और ‘सतुआ’ का प्रसाद भी उपलब्ध रहता है।

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