लखनऊ: उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी और जनप्रतिनिधियों के बीच अक्सर खींचतान की खबरें आती रहती हैं, लेकिन अब शासन ने इस पर पूर्णविराम लगाने के लिए एक बेहद कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश के मुख्य सचिव शशि गोयल ने एक नया शासनादेश (Government Order) जारी किया है, जो सीधे तौर पर सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के व्यवहार को लेकर है।
क्या है नया प्रोटोकॉल?
नए आदेश के मुताबिक, अब सरकारी दफ्तरों में सांसदों और विधायकों के आने पर अफसरों को न केवल उनका सत्कार करना होगा, बल्कि कुछ अनिवार्य शिष्टाचारों का पालन भी करना होगा:
- खड़े होकर स्वागत: सांसद या विधायक के दफ्तर में प्रवेश करते ही अधिकारी को अपनी कुर्सी से खड़े होकर उनका अभिवादन करना होगा।
- शिष्टाचार और विदाई: उन्हें ससम्मान बैठाना, पानी पूछना और काम होने के बाद सम्मान के साथ विदा करना अनिवार्य कर दिया गया है।
- कॉल उठाना अनिवार्य: अफसरों को अपने मोबाइल में सभी सांसदों और विधायकों के नंबर सेव रखने होंगे। अगर किसी कारणवश मीटिंग में कॉल नहीं उठा पाते, तो तुरंत मैसेज करना होगा और फ्री होते ही कॉल बैक करना अनिवार्य होगा।
क्यों पड़ी इस आदेश की जरूरत?
दरअसल, यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। शासन के संज्ञान में आया है कि 2017 से लेकर अब तक लगभग 15 बार ऐसे ही दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद जनप्रतिनिधियों की ओर से लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि:
- अधिकारी उनका फोन रिसीव नहीं करते।
- दफ्तर पहुंचने पर प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया जाता।
- जनता की समस्याओं को लेकर जनप्रतिनिधियों की बात को अनसुना कर दिया जाता है।
मुख्य सचिव ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि इतनी बार निर्देश देने के बावजूद प्रोटोकॉल का उल्लंघन होना “अत्यंत खेदजनक” है।
लापरवाही बरती तो होगी बड़ी कार्रवाई
इस बार सरकार केवल सलाह नहीं दे रही है। शासनादेश में साफ चेतावनी दी गई है कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा इन नियमों की अनदेखी की जाती है, तो उनके खिलाफ ‘उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली’ के तहत कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सियासी गलियारों में चर्चा
यह मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी कई बार गूँज चुका है, जहाँ पक्ष और विपक्ष दोनों के ही विधायकों ने नौकरशाही के ‘अड़ियल’ रवैये पर सवाल उठाए थे। माना जा रहा है कि इस नए आदेश से जनता की समस्याओं के निस्तारण में तेजी आएगी, क्योंकि विधायक और सांसद सीधे तौर पर जनता की शिकायतों को अफसरों तक पहुँचाते हैं।










