​”चंदौली में फोटो सेशन की पराकाष्ठा: स्मृति द्वार पर महापुरुष गायब, विधायक रमेश जायसवाल की तस्वीर सुपर हिट!”

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​”पड़ाव चौराहे पर बड़ा राजनीतिक ब्लंडर: क्या अंत्योदय के प्रणेता से बड़े हो गए स्थानीय माननीय?”

​’पंडित जी’ के नाम पर बना द्वार, लेकिन द्वार से ‘पंडित जी’ ही गायब! पड़ाव चौराहे पर यह कैसा ‘स्मृति’ मज़ाक?

​चंदौली (मुगलसराय): राजनीति में खुद को चमकाने और ‘फोटो सेशन’ की भूख जब विचारधारा पर हावी हो जाए, तो तस्वीरें कुछ ऐसी ही विरोधाभासी और हैरान करने वाली सामने आती हैं। ताज़ा मामला जनपद चंदौली के मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले वीआईपी ‘पड़ाव चौराहे’ का है। यहाँ बने पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति द्वार को देखकर स्थानीय जनता और राहगीर दंग हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि जिस महापुरुष के नाम पर इस भव्य स्मृति द्वार की नींव रखी गई, वही महापुरुष इस पूरे बोर्ड से ‘लापता’ हैं!

स्मृति द्वार या नेताओं का विज्ञापन बोर्ड?

​पड़ाव चौराहे पर लगे इस मुख्य स्वागत बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है— “पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति द्वार”, लेकिन जब आप इस बोर्ड पर तस्वीरों को ढूंढेंगे, तो आपको अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहीं नज़र नहीं आएंगे। इसके विपरीत, बोर्ड के दाहिने हिस्से पर क्षेत्रीय भाजपा विधायक रमेश जायसवाल की चमचमाती हुई बड़ी सी तस्वीर लगी है, और उनके ठीक बगल में आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का चित्र लगा हुआ है।

अब जनता के बीच यह तीखा सवाल तैर रहा है कि क्या यह सचमुच किसी महापुरुष का ‘स्मृति द्वार’ है या फिर स्थानीय माननीय का अपना व्यक्तिगत ‘फोटो सेशन’ और प्रचार का अड्डा?

विचारधारा से बड़ा हुआ आत्म-प्रचार?

​भारतीय जनता पार्टी जिस पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ और ‘अंत्योदय’ की कसमें खाते नहीं थकती, उन्हीं के नाम पर बने तोरण द्वार से उनकी तस्वीर को ही गायब कर देना, पार्टी के भीतर की जमीनी हकीकत और नेताओं की प्रचार-लोलुपता को सरेआम उजागर करता है। डॉ. हेडगेवार और खुद की तस्वीर को मुख्य जगह देकर विधायक जी ने यह तो साबित कर दिया कि उन्हें अपनी और संघ की ब्रांडिंग की पूरी चिंता है, लेकिन जिनके नाम पर पूरा मुगलसराय (पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर) जाना जाता है, उन्हें ही इस स्मृति द्वार पर एक अदद कोने की जगह तक नसीब नहीं हुई।

जनता पूछ रही सवाल— यह कैसी श्रद्धांजलि?

​पड़ाव चौराहे से गुजरने वाले प्रबुद्ध नागरिकों और राहगीरों का कहना है कि यह केवल एक चूक नहीं, बल्कि महापुरुषों की वैचारिक विरासत का घोर अपमान है।

क्या सरकारी या सार्वजनिक फंड से बनने वाले स्मृति द्वारों का इस्तेमाल सिर्फ नेता जी अपनी चमचागिरी और फोटो चमकाने के लिए करेंगे?

क्या खुद को ‘पंडित जी’ का सबसे बड़ा अनुयायी बताने वाले भाजपाइयों को इस बोर्ड को हरी झंडी देते समय यह कमी दिखाई नहीं दी?

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