वाराणसी (डोमरी): धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। जिस डोमरी गाँव को देश के प्रधानमंत्री ने बड़े चाव से ‘गोद’ लिया था, आज उसी गाँव की गलियां बेगुनाह किसानों के आंसू और एक साध्वी की चीखों से थर्रा उठी हैं। विकास के नाम पर चल रहे नगर निगम के बुल्डोजर ने आज सिर्फ निर्माण ही नहीं, बल्कि एक जीवन को भी मलबे में तब्दील कर दिया।
साध्वी की गुहार, तंत्र का अहंकार
गंगा पार स्थित सद्गुरु धाम आश्रम में जब प्रशासन का बुल्डोजर पेड़ों और निर्माण को रौंदने पहुँचा, तो 70 वर्षीय साध्वी हीरामनी ने अपनी आँखों के सामने जीवन भर की तपस्या को उजड़ते देखा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, साध्वी अधिकारियों के सामने हाथ जोड़कर पेड़ों को न काटने की भीख मांगती रहीं, लेकिन खाकी और प्रशासन की ‘तानाशाही’ के आगे उनकी एक न सुनी गई। नतीजा यह हुआ कि तंत्र की इस संवेदनहीनता को साध्वी का वृद्ध हृदय सह न सका और सदमे के कारण उन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया।






संत समाज में भारी रोष: “योगी बाबा, न्याय करो!”
इस घटना के बाद काशी के संत समाज में उबाल है। संतों का सीधा आरोप है कि यह स्वाभाविक मौत नहीं, बल्कि प्रशासनिक हत्या है।
आरोप: अधिकारियों ने बिना किसी मानवीय संवेदना के जबरन कार्रवाई की।
मांग: संत समाज ने सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ से गुहार लगाई है कि “साधु-संतों का उत्पीड़न करने वाले इन बेलगाम अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई हो।”
अधिकारियों का पल्ला झाड़ने वाला बयान
एक तरफ जहाँ पूरा आश्रम मातम में डूबा है, वहीं वाराणसी प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी अपनी खाल बचाने में जुटे हैं। मामले पर सफाई देते हुए एसडीएम वाराणसी ने अजीबोगरीब तर्क दिया कि “साध्वी की मौत सुबह ही हो चुकी थी।” सवाल यह उठता है कि अगर मौत पहले हुई थी, तो प्रशासन ने तनावपूर्ण स्थिति में संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई? क्या यह बयान सिर्फ अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश है?
बड़ा सवाल: क्या प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में गरीबों और संतों की आवाज इसी तरह बुल्डोजर के नीचे दबाई जाएगी? क्या ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा डोमरी के इन बिलखते किसानों और संतों के लिए नहीं है?










