प्रशासनिक शह या भ्रष्टाचार की इंतहा? मिर्जापुर के ‘पॉपुलर हॉस्पिटल’ को 15 दिन बंद करने के नोटिस पर भी ठप पड़ी कार्रवाई
मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भले ही राज्य में जीरो टॉलरेंस नीति और नियम-कानून के सख्त पालन का दावा करती हो, लेकिन मिर्जापुर जिले में जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। जंगी रोड स्थित पॉपुलर हॉस्पिटल को 15 दिनों के लिए बंद करने (सीलिंग/अस्थायी रोक) का नोटिस दिए जाने के बावजूद, अब तक उस पर कोई धरातलीय कार्रवाई नहीं हुई है।
स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे चल रही इस मनमानी ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी आदेशों की धज्जियां कैसे खुलेआम उड़ाई जा रही हैं।
अधिकारियों की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल
प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रशासनिक अधिकारियों को इस पूरे मामले और जारी नोटिस की भली-भांति जानकारी है। इसके बावजूद अस्पताल का संचालन बिना किसी डर के जारी रहना विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली और उनकी मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है:
- कार्रवाई से परहेज क्यों? नोटिस की अवधि बीत जाने या प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी प्रशासनिक अमला मौन क्यों साधे बैठा है?
- किसके संरक्षण में चल रहा खेल? स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की इस ढिलाई के पीछे क्या कोई बड़ा सियासी या प्रशासनिक संरक्षण है?
- आम जनता की सेहत से खिलवाड़: जब किसी अस्पताल पर नियमों के उल्लंघन के चलते 15 दिनों का प्रतिबंध लगाया जाता है, तो वहां मरीजों का इलाज जारी रहना सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी?
स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह मामला केवल एक अस्पताल के नोटिस का नहीं, बल्कि व्यवस्था में व्याप्त गहरे भ्रष्टाचार का जीता-जागता प्रमाण है। नोटिस केवल कागजों और फाइलों तक सीमित रह जाते हैं, जबकि धरातल पर सांठ-गांठ का खेल चलता रहता है।
“सरकार भले ही अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कड़े नियम बनाए, लेकिन जब स्थानीय अफसर ही उन आदेशों की धज्जियां उड़ाने में मददगार बन जाएं, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे?”
उठती मांगें और चेतावनी
इस मामले को लेकर अब जन आक्रोश भी पनपने लगा है। स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों की मांग है कि:
- शासन और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारी तुरंत हस्तक्षेप करें।
- नोटिस के बाद भी अस्पताल का संचालन करने वालों और इसमें लापरवाही बरतने वाले अफसरों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
- मामले की उच्चस्तरीय जांच कर यह उजागर किया जाए कि आदेशों की अनदेखी किसके इशारे पर की जा रही है।










